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August 14, 2026हल्द्वानी में रहने वाली एक लड़की मिट्टी में बीज लगा रही थी। बगल में रहने वाली उसकी दोस्त ने पूछा, “ये क्या कर रही हो?”
उसने कहा, “हरेला बो रही हूँ।”
दोस्त ने फिर पूछा, “ये हरेला क्या होता है?”
जवाब आया, “हरे-पीले रंग की लंबी पत्तियाँ।”
लेकिन हरेला केवल हरी-पीली पत्तियों का नाम नहीं है। यह उत्तराखण्ड की संस्कृति, खेती-बाड़ी, पारिवारिक परंपराओं और प्रकृति के प्रति सम्मान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पर्व है।
हरेला क्या है?
हरेला देवभूमि उत्तराखण्ड का एक प्रमुख त्योहार है। यह पर्व प्रकृति, हरियाली और खेती-बाड़ी से जुड़ा हुआ है। हरेला का अर्थ है हरियाली का आगमन।
यह नई फसल, वर्षा ऋतु और खेती के नए चक्र के आरम्भ का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से कुमाऊँ क्षेत्र में इस पर्व का बहुत महत्व है।
हरेला कब मनाया जाता है?
सावन का हरेला श्रावण मास के प्रथम दिवस यानी 1 गते को हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन कर्क संक्रांति भी होती है, क्योंकि सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है।
हरेला चैत्र नवरात्र, शारदीय नवरात्र और श्रावण मास के अवसर पर बोया और काटा जाता है। इनमें सावन में मनाया जाने वाला हरेला सबसे अधिक प्रचलित और विशेष माना जाता है।
हरेला बोने की तैयारी
हरेला बोने के लिए सामान्यतः साफ और भुरभुरी दोमट मिट्टी का उपयोग किया जाता है। मिट्टी को सुखाकर अच्छी तरह बुरबुरा कर लिया जाता है।
इसके बाद जौ, गेहूँ, धान, मक्का, तिल, उड़द, मटर और लोबिया जैसे कई प्रकार के अनाजों के बीजों को एकत्र कर मिलाया जाता है। बीजों की संख्या और प्रकार अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों की परंपराओं के अनुसार बदल सकते हैं।
हरेला कैसे बोया जाता है?
हरेला बोने के लिए सबसे पहले दो या उससे अधिक दौने लिए जाते हैं। उनमें साफ और चौड़े पत्ते बिछाकर छोटी लकड़ी से छेद किए जाते हैं, ताकि मिट्टी को हवा मिल सके।
इसके बाद दौने में अक्षत-पिठिया लगाकर मिट्टी की एक परत बिछाई जाती है और उसके ऊपर बीज डाले जाते हैं। स्थानीय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार मिट्टी और बीजों की कई परतें लगाई जाती हैं।
आखिर में हल्के जल का छिड़काव किया जाता है। अगले दिन से हरेला काटे जाने तक सुबह-शाम थोड़ा-थोड़ा पानी दिया जाता है।
पहाड़ में लोग अपनी परंपरा के अनुसार हरेला पर्व से लगभग नौ से ग्यारह दिन पहले बीज बोते हैं। कुछ दिनों बाद इन बीजों से हरे-पीले रंग की लंबी पत्तियाँ निकल आती हैं, जिन्हें हरेला कहा जाता है।
हरेला काटने और पूजा की परंपरा
हरेले वाले दिन पूजा-पाठ के बाद उसे काटकर भगवान शिव, माता पार्वती और उनके परिवार को चढ़ाया जाता है।
इसके बाद घर की बुजुर्ग महिलाएँ परिवार के अन्य सदस्यों को हरेला लगाकर आशीर्वाद देती हैं। वे पाँव से सिर की ओर हरेला फेरती हैं और फिर उसे कान पर रखती हैं।
बड़े प्रेम से यह शुभ आशीष दी जाती है—
जी रैया, जागी रैया,
दुब जैसा खिली रैया।
यौ दिन, यौ मास भेटनै रैया॥

इस आशीर्वचन का भाव है कि तुम जीवित और जागरूक रहो, दूब की तरह फलते-फूलते रहो और जीवन में यह शुभ दिन और महीना बार-बार देखते रहो।
घर के दरवाजे पर हरेला लगाने की परंपरा
हरेले के दिन पहाड़ के कई घरों के दरवाजों पर गाय के गोबर की सहायता से चिपकाई गई हरेले की पत्तियाँ भी दिखाई देती हैं।
यह परंपरा घर की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और परिवार के कल्याण की कामना से जुड़ी हुई मानी जाती है।
पौधरोपण और पर्यावरण का संदेश
हरेले के दिन पौधा लगाने की भी कुमाऊँ में पुरानी परंपरा रही है। यह पर्व वर्षा ऋतु, खेती और हरियाली के आगमन से जुड़ा हुआ है।
वर्तमान समय में हरेला पर्व के अवसर पर बड़े स्तर पर पौधरोपण और प्रकृति संरक्षण के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इसका उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उनकी देखभाल और संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना भी है।
इस प्रकार हरेला केवल हरी-पीली पत्तियों का नाम नहीं है। यह उत्तराखण्ड की कृषि परंपरा, पारिवारिक आशीर्वाद, लोक संस्कृति और प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे संबंध का प्रतीक है।

